1000+ Sher-o-Shayari in Hindi To Share on WhatsApp and Facebook

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Best Sher-o-Shayari

शायरों की बस्ती में कदम रखा तो जाना
गमों की महफिल भी कमाल की जमती है

अकेले हम बूँद हैं,
मिल जाएं तो सागर हैं
अकेले हम धागा हैं,
मिल जाएं तो चादर हैं
अकेले हम कागज हैं,
मिल जाए तो किताब हैं

पुछ कर देख अपने दिल से की हमे भुलना चहाता है क्या
अगर उसने हा कहा तो कसम से महोब्बत करना छोङ देगे

आज कुछ और नहीं बस इतना सुनो
मौसम हसीन है लेकिन तुम जैसा नहीं

गलतफहमी की गुंजाईश नहीं सच्ची मोहब्बत में
जहाँ किरदार हल्का हो,
कहानी डूब ही जाती है

तन्हाइयों का एक अलग ही सुरुर होता है
इसमें डर नहीं होता.किसी से बिछड जाने का

जिंदगी बहुत कुछ सिखाती है ,
कभी हँसाती है तो कभी रुलाती है ,
पर जो हर हाल में खुश रहते हैं ,
जिंदगी उन्ही के आगे सर झुकाती है।

थोड़ा मैं ,
थोड़ी तुम,
और थोड़ी सी मोहब्बत
बस इतना काफी है,
जीने के लिये…

हदे शहर से निकली तो गाँव गाँव चली,
कुछ यादें मेरे संग पांव-पांव चली,
सफ़र जो धुप का हुआ तो तजुर्बा हुआ,
वो जिंदगी ही क्या जो छाँव छाँव चली।

मुझे अपनी वफादारी पे कोई शक नही होता
मैं खून-ए-दिल मिला देता हु जब झंडा बनाता हु

इरादे बाँधता हूँ सोचता हूँ तोड़ देता हूँ
कही ऐसा ना हो जाए कही वैसा ना हो जाए

ये मंजिलें बड़ी जिद्दी होती हैं,
हासिल कहां नसीब से होती हैं।
मगर वहां तूफान भी हार जाते हैं,
जहां कश्तियां जिद्द पे होती हैं।।

तुम से मिल कर इमली मीठी लगती है….
तुम से बिछड़ कर शहद भी खारा लगता है

नशा था उनके प्यार का
जिसमें हम खो गए
उन्हें भी पता नहीं चला कि कब हम उनके हो गए

नशा हम करते हैं
इलज़ाम शराब को दिया जाता है
मगर इल्ज़ाम शराब का नहीं उनका है
जिनका चेहरा हमें हर जाम में नज़र आता है

अपनों के दरमियां सियासत फ़िजूल है
मक़सद न हो कोई तो बग़ावत फ़िजूल है।
​​रोज़ा,
नमाज़,
सदक़ा-ऐ-ख़ैरात या हो हज
माँ बाप ना खुश हों,
तो इबादत फ़िजूल है।

अपने नहीं तो अपनों का साथ क्या होगा
सपनों में हो उनसे मुलाकात तो क्या होगा
सुबह से शाम तक हमें इंतजार हो जिनका
वादों में कटे रात तो रात का क्या होगा

खींच कर आज मुझे मेरे घर लायी है
मेरे बचपन की यादे मेरे मन में समायी है
अब ना चाहिए मुझे दौलत इस दुनिया की
मेरी माँ की मोहब्बत मेरी उम्र भर की कमाई है

एक आँसू कह गया सब हाले दिल का
मै समझती थी ये ज़ालिम बे जुबान है

तुमसे क्या गिला करना गुजारिश है मिला करना
जिंदगी मेरी आसान होगी बस साँसों में घुला करना

दिल होना चाहिए जिगर होना चाहिए
आशिकी के लिए हुनर होना चाहिए
नजर से नजर मिलने पर इश्क नहीं होता
नजर के उस पार भी एक असर होना चाहिए

कितने मासूम होते है ये आँखों के आँसू भी
ये निकलते भी उन के लिए है जिन्हे इनकी परवाह तक नहीं होती

एक इक बात में सच्चाई है उस की लेकिन
अपने वादों से मुकर जाने को जी चाहता है

उडने दो परींदो को अभी शोख हवा में
फिर लौट के बचपन के जमाने नहीं आते

मुझे देखने से पहले साफ़ कर;अपनी आँखों की पुतलियाँ ग़ालिब
कहीं ढक ना दे मेरी अच्छाइयों को भी;नज़रों की ये गन्दगी तेरी

रात तो अपने समय पर ही होती है
इक तेरा ख्याल है जो कभी भी आ जाता है

जो देखता हूँ वही बोलने का आदी हूँ
मैं अपने शहर का सब से बड़ा फ़सादी हूँ

ग़ज़लों का हुनर साकी को सिखायेंगे
रोएंगे मगर आँसू नहीं आयेंग
कह देना समंदर से हम ओस के मोती हैं
दरिया की तरह तुझसे मिलने नहीं आयेंगे

समझा है हक़ को अपने ही जानिब हर एक शख़्स
ये चाँद उस के साथ चला जो जिधर गया

मेरी यादो मे तुम हो,
या मुझ मे ही तुम हो
मेरे खयालो मे तुम हो,
या मेरा खयाल ही तुम हो
दिल मेरा धडक के पूछे,
बार बार एक ही बात
मेरी जान मे तुम हो,
या मेरी जान ही तुम हो

न रख इतना गुरूर अपने नशे में ए शराब
तुझसे ज्यादा नशा रखती हैं आँखे किसी की

दीवाने है तेरे नाम के इस बात से इंकार नहीं
कैसे कहें कि तुमसे प्‍यार नहीं

कुछ तो कसूर है आपकी आखों का
हम अकेले तो गुनहगार नहीं

इतनी पीता हूँ कि मदहोश रहता हूँ
सब कुछ समझता हूँ पर खामोश रहता हूँ
जो लोग करते हैं मुझे गिराने की कोशिश
मैं अक्सर उन्ही के साथ रहता हूँ

मैं सच कहूँगी मगर फिर भी हार जाऊँगी
वो झूट बोलेगा और ला-जवाब कर देगा

जिसकी सोच में खुद्दारी की महक है,
जिसके इरादों में हौसले की मिठास है,
और जिसकी नियत में सच्चाई का स्वाद है,
उसकी पूरी जिन्दगी महकता हुआ गुलाब है।

देखकर दर्द किसी का जो आह निकल जाती है,
बस इतनी से बात आदमी को इंसान बनाती है ।

वाक़िआ कुछ भी हो सच कहने में रुस्वाई है
क्यूँ न ख़ामोश रहूँ अहल-ए-नज़र कहलाऊँ

मेरी मोहब्बत की हद मत तय करना तुम…
तुम्हें सांसों से भी ज्यादा मोहब्बत करते हैं हमताल्लुक़ कौन रखता है किसी नाकाम से लेकिन,

मिले जो कामयाबी सारे रिश्ते बोल पड़ते हैं,
मेरी खूबी पे रहते हैं यहां,
अहल-ए-ज़बां ख़ामोश,
मेरे ऐबों पे चर्चा हो तो,
गूंगे बोल पड़ते हैं।

ये ना समझना कि खुशियों के ही तलबगार हैं हम…
तुम अगर अश्क भी बेचो तो,
उसके भी खरीददार हैं हम…

कितनी पी कैसे कटी रात मुझे होश नहीं
रात के साथ गई बात मुझे होश नहीं
मुझको ये भी नहीं मालूम कि जाना है कहाँ
थाम ले कोई मेरा हाथ मुझे होश नहीं

बहाना मिल न जाये बिजलियों को टूट पड़ने का
कलेजा काँपता है आशियाँ को आशियाँ कहते

चले गए है दूर कुछ पल के लिए
मगर करीब है हर पल के लिए
किसे भुलायेंगे आपको एक पल केलिए
जब हो चूका है प्यार उम्र भर के लिए

लडते रहते हैं दो मुल्कों की तरह तुम्हारे लिए
तुम्हारी क्या खता है इसमें तुम हो ही कश्मीर सी सुंदर

मुस्कुराने की आदत भी कितनी महंगी पड़ी हमें…
छोड़ गया वो ये सोच कर कि हम जुदाई में भी खुश हैं

]कैसे लिखोगे मोहब्बत की किताब
तुम तो करने लगे पल-पल का हिसाब

दीवाने है तेरे नाम के इस बात से इंकार नहीं
कैसे कहें कि तुमसे प्‍यार नहीं

कुछ तो कसूर है आपकी आखों का
हम अकेले तो गुनहगार नहीं

शायरी नही आती मुझे बस हेल दिल सुना रही हूँ
बेवफाई का इलज़ाम है मुझपर फिर भी गुनगुना रही हूँ
क़त्ल करने वालो ने कातिल भी हमे ही बना दिया
खफा नही उससे फिर भी मै बस उसका दामन बचा रही हूँ

कांच जैसे होते हैं हम तन्हां जैसे लोगों के दिल,
कभी टूट जाते हैं और कभी तोड़ दिए जाते हैं

मौसम बदल गये जमाने बदल गये
लम्हों में दोस्त बरसों पुराने बदल गये
दिन भर रहे जो मेरी मौहब्बत की छॉंव में
वो लोग धूप ढलते ही ठिकाने बदल गये

हजारों ऐब हैं मुझमे,
न कोई हुनर बेशक,
मेरी खामी को तुम खूबी में तब्दील कर देना,
मेरी हस्ती है एक खारे समंदर से मेरे दाता,
अपनी रहमतों से इसे मीठी झील कर देना।

शायरी उसी के लबों पर सजती है साहिब
जिसकी आँखों में __इश्क़__ रोता हो

तुम्हारी सुन्दर आँखों का मकसद कहीं ये तो नहीं
कि जिसको देख लें उसे बरबाद कर दें

कभी नजरे मिलानेे मे जमाना बीत जाता है
कभी नजरे चुराने मे जमाना बीत जाता है

मुझसे बेवफाई की इन्तहा क्या पूछते हो
वह मुझसे मोहब्बत दिखती है किसी और के लिए

किसी ने आज पूछा हमसे कहाँ से लाते हो ये शायरी
मैं मुस्करा के बोला: उसके ख्यालो मे डूब कर

उसी की तरह मुझे सारा ज़माना चाहे
वो मेरा होने से ज़्यादा मुझे पाना चाहे
मेरी पलकों से फिसल जाता है चेहरा उसका
ये मुसाफ़िर तो कोई और ठिकाना चाहे
एक बनफूल था इस शहर में वो भी न रहा
कोई अब किस के लिए लौट के आना चाहे

कभी मतलब के लिए तो कभी बस दिल्लगी के लिए
हर कोई मोहाब्बत ढूँढ़ रहा है यहाँ अपनी तन्हा सी ज़िन्दगी के लिए

मेरी नजरों की तरफ देख जमानें पे न जा
इक नजर फेर ले,
जीने की इजाजत दे दे
रुठ ने वाले वो पहली सी मोहब्बत दे दे
इश्क मासुम है,
इल्जाम लगाने पे न जा

रूकता भी नहीं ठीक से चलता भी नही
यह दिल है के तेरे बाद सँभलता ही नही

वो नाकाम मोहब्बत है तू कर एक और मोहब्बत
सुना हूँ इश्क दर्द भी है दवा भी

क्या लाज़वाब था तेरा छोड़ के जाना…
भरी भरी आंखों से मुस्कुराये थे हम

सुर्ख आँखों से जब वो देखते हैं
हम घबराकर आँखें झुका लेते हैं
क्यों मिलायें उन आँखों से आँखें
सुना है वो आँखों से ही अपना बना लेते हैं

जिसकी चाहत मे हमने सारी दुनियॉ भुला दी
उस शखस ने दो पल मे ही हमारी हसती मिटा दी.
मिटा तो हम भी सकते थे पहचान उसकी दिल से
पर उसकी मासूमियत को देखकर हमने
अपनी ये आरजू भी भुला दी.

रूठे जो जिदगी तो मना लेगे हम
मिले जो गम तो निभा लेगे हम बस तुम रहना साथ हमारे
पिघलते आँसू मे भी मुस्कुरा लेग

झूट वाले कहीं से कहीं बढ़ गए
और मैं था कि सच बोलता रह गया

इश्क़ में कौन बता सकता है
किस ने किस से सच बोला है

आंखे थी जो कह गई सब कुछ
लफ्ज होते तो मुकर गए होते।

वो मेरे हाथो की लकीरे देखकर अक्सर Mayush हो जाती थी
शायद उसे भी एहसास हो गया था कि वो मेरी Kismat मे नही

यूँ असर डाला है मतलब-परस्ती ने दुनिया पर कि,
हाल भी पूछो तो लोग समझते हैं,
कोई काम होगा ।

मुझे मालूम नहीं कि मेरी आँखों को तलाश किस की है
पर तुझे देखूं तो बस मंज़िल का गुमान होता है

औरों की तरह ‘मैं नहीं लिखता ‘डायरियाँ
बस ‘याद आती है तेरी’और ‘बन जाती है’शायरिया

तुम से बेहतर तो नहीं हैं…ये नजारे,
लेकिन.
तुम जरा आँख से निकलो,
तो…. इन्हें भी देखूं

तेरी आजमाइश कुछ ऐसी थी खुदा,
आदमी हुआ है आदमी से जुदा,
ज़माने को ज़माने की लगती होगी,
पर धरती को किसकी लगी है बाद दुआ,
उदासी से तूफान के बाद परिंदे ने कहा,
चलो फिर आशियाँ बनाते हैं जो हुआ सो हुआ।

प्यार कहो तो दो ढाई लफज़,
मानो तो बन्दगी
सोचो तो गहरा सागर,
डूबो तो ज़िन्दगी
करो तो आसान ,
निभाओ तो मुश्किल
बिखरे तो सारा जहाँ ,
और सिमटे तो ” तुम

हमारे इकरार के इरादे को दे जाता है हर रोज शिकस्त
किसी और के लिये तेरा हल्का सा महफील मे मुस्कुरा देना

कभी ख़ुशी से खुशी की तरफ़ नहीं देखा
तुम्हारे बाद किसी की तरफ़ नहीं देखा
ये सोचकर कि तेरा इन्तज़ार लाजमी है
तमाम उम्र घड़ी की तरफ़ नहीं देखा

पूछता है जब कोई दुनिया में मोहब्बत है कहाँ,
मुस्करा देता हूँ और याद आ जाती है माँ।

साथ ना रहने से रिश्ते टूटा नहीं करते
वक़्त की धुंध से लम्हे टूटा नहीं करते
लोग कहते हैं कि मेरा सपना टूट गया
टूटी नींद है ,
सपने टूटा नहीं करते

तु कोशिश तो कर किसी गरीब की मदत करने की
ये तेरे होठ खुद व खुद ही मुस्करा देंगे

आसमानों से फ़रिश्ते जो उतारे जाएँ
वो भी इस दौर में सच बोलें तो मारे जाएँ

हो ना जाए हुश्न की शान में गुस्ताखी कही
तुम चले जाओ तुम्हे देख कर प्यार आता है

तेरे लफ़्ज़ों को शिद्दत से पढ़ने में सुकून मिलता है
तुम्हारी इन प्यारी यादों को भूलना ही कौन चाहता है

रंगों के बिना जिंदगी में रंग क्या होगा
तुम नहीं तो जिंदगी का ढंग क्या होगा
तुम्हारे बिना कटता नहीं इक पल हमारा
तन्हाईयों से भरी रात का संग क्या होगा

किस काम की ऐसी सच्चाई जो तोड़ दे उम्मीदें दिल की
थोड़ी सी तसल्ली हो तो गई माना कि वो बोल के झूट गया

भटके हुओं को जिंदगी में राह दिखलाते हुए,
हमने गुजारी जिंदगी दीवाना कहलाते हुआ।

ज़मीर जिन्दा रख,
कबीर जिंदा रख,
सुल्तान भी बन जाये तो,
दिल में फ़कीर जिंदा रख,
हौसले के तरकश में कोशिश का वो तीर जिंदा रख,
हार जा चाहे जिंदगी में सब कुछ,
मगर फिर से जीतने की उम्मीद जिंदा रख।

जमीन जल चुकी है आसमान बाकि है ,
वो जो खेतों की मदों पर उदास बैठे हैं,
उन्ही की आँखों में अब तक ईमान बाकि है ,
बादलों अब तो बरस जाओ सूखी जमीनों पर ,
किसी का घर गिरवी है और किसी का लगान बाकि है ।

उल्फत में अक्सर ऐसा होता है
आँखे हंसती हैं और दिल रोता है
मानते हो तुम जिसे मंजिल अपनी
हमसफर उनका कोई और होता है

काम उनके जो बस काम किया करते हैं
अपने सपनों को अंजाम दिया करते हैं
पता नहीं फिर कुछ लोग रंग क्यों बदलते हैं
मुश्किल उनसे जो बदनाम किया करते हैं

सोचता हूँ बंद करूँ लिखना शायरी ये किसी के काम नहीं आती
उसकी याद तो दिलाती है पर उस का दीदार नहीं कराती

पता नही कब जाएगी तेरी लापरवाही की आदत
पगली कुछ तो सम्भाल कर रखती,
मुझे भी खो दिया

दोस्ती अच्छी हो तो रंग़ लाती है
दोस्ती गहरी हो तो सबको भाती है
दोस्ती नादान हो तो टूट जाती है
पर अगर दोस्ती अपने जैसी हो
तो इतिहास बनाती है

झूट बोला है तो क़ाएम भी रहो उस पर ‘ज़फ़र’
आदमी को साहब-ए-किरदार होना चाहिए

मेरी महोब्बत का अन्दाजा कभी मत लगाना …
हिसाब हम लेंगे नहीं और चुका तुम पाओगे नहीं

कभी मतलब के लिए तो कभी बस दिल्लगी के लिए
हर कोई मोहाब्बत ढूँढ़ रहा है यहाँ
अपनी तन्हा सी ज़िन्दगी के लिए

दिन तो जैसे तैसे गुजर जाता है
रात कि तन्हाई बहुत सताती है
इतना तो क़रीब रहो दूर ना लगे
जिंदगी भी अजानबी सी लगती है

कहिए जो झूट तो हम होते हैं कह के रुस्वा
सच कहिए तो ज़माना यारो नहीं है सच का

ताउम्र बस एक ही सबक याद रखिये,
दोस्ती और इबादत में नीयत साफ़ रखिये।

जी बहुत चाहता है सच बोलें
क्या करें हौसला नहीं होता

हुस्न वालों को क्या जरूरत है संवरने की
वो तो सादगी में भी क़यामत की अदा रखते हैं

जिन्हें ये फ़िक्र नहीं सर रहे रहे न रहे
वो सच ही कहते हैं जब बोलने पे आते हैं

बचपन भी कमाल का था खेलते खेलते चाहें छत पर
सोयें या ज़मीन पर,
आँख बिस्तर पर ही खुलती थी

काम उनके जो बस काम किया करते हैं
अपने सपनों को अंजाम दिया करते हैं
पता नहीं फिर कुछ लोग रंग क्यों बदलते हैं
मुश्किल उनसे जो बदनाम किया करते हैं

खामोशियाँ – बहुत कुछ कहती हैं
कान नही दिल लगा कर सुनना पड़ता है

ना हवस तेरे जिस्म की,
ना शौक तेरी खूबसूरती का
बेमतलबी सा बन्दा हूँ .
बस तेरी सादगी पे मरता हूँ

भरे बाजार से अक्सर ख़ाली हाथ ही लौट आता हूँ,
पहले पैसे नहीं थे अब ख्वाहिशें नहीं रहीं।

चले गए है दूर कुछ पल के लिए
मगर करीब है हर पल के लिए
किसे भुलायेंगे आपको एक पल केलिए
जब हो चूका है प्यार उम्र भर के लिए

इतना सच बोल कि होंटों का तबस्सुम न बुझे
रौशनी ख़त्म न कर आगे अँधेरा होगा

आये हो आँखों में तो कुछ देर तो ठहर जाओ
एक उम्र लग जाती है एक ख्वाब सजाने में

चल पड़ते है कदम जिस तरफ़ तेरी याद मिले
हर सफ़र का हो कोई मकाम ज़रूरी तो नही
बगिया लगती है खुबसूरत,
हसीन फूलों से
खुशबू बिखेरे वोह तमाम ज़रूरी तो नही
बहेकने के लिए तेरा एक खयाल काफी है सनम
हाथो मे हो फ़िर से कोई जाम ज़रूरी तो नही

मिलावट है तेरे इश्क में इत्र और शराब की
कभी हम महक जाते हैं तो कभी बहक जाते हैं

तुम एक दिन लौट के आओगे मुझे इतना यकीन है
ये और बात है मै रहू या ना रहू इस दुनिया में

जिसकी जितनी परवाह की जाये वो
उतना ही बे-परवाह हो जाता है

हम अल्फाजो को ढूढते रह गए
और वो आँखों से गज़ल कह गए

खाली हो चला दिल अहसासों से
न दिल कुछ कहता है न कलम कुछ लिखती है

कुछ लोग जो ख़ामोश हैं ये सोच रहे हैं
सच बोलेंगे जब सच के ज़रा दाम बढ़ेंगे

मुस्कुराते हैं तो बिजली सी गिरा देते हैं
बात करते हैं तो दीवाना बना देते हैं

हुस्न वालों की नजर कयामत से कम नही
आग पानी में भी नजरों से लगा देते हैं

हर हक़ीक़त है एक हुस्न ‘हफ़ीज़’
और हर हुस्न इक हक़ीक़त है

तु है सुरज तुझे मालुम कहां रात का दुख
तु किसी रोज मेरे घर मे उतर शाम के बाद

हम तो वो हे जो तेरी बातेँ सुन कर तेरे हो गए थे
वो और होंगे जिन्हे मोहब्बत चेहरो से होती हो

अपनी उलझन में ही अपनी,
मुश्किलों के हल मिले ,
जैसे टेढ़ी मेढ़ी शाखों पर भी रसीले फल मिले ,
उसके खारेपन में भी कोई तो कशिश जरुर होगी,
वर्ना क्यूँ जाकर सागर से यूँ गंगाजल मिले ।

जिसने कहा कल,
दिन गया टल,
जिसने कहा परसों,
बीत गए बरसो
जिसने कहा आज,
उसने किया राज।

कुछ रिश्तों को कभी भी… नाम ना देना तुम
इन्हें चलने दो ऐसे ही… इल्ज़ाम ना देना तुम
ऐसे ही रहने दो तुम… तिश्नग़ी हर लफ़्ज़ में
के अल्फ़ाज़ों को मेरे… अंज़ाम ना देना तुम

दुनिया की भीड़ में तुझे याद कर सकूँ कुछ पल
अजनबी राहों की तरफ कदम मोड़ता हूँ

मेरे लफ़्ज़ों को इतनी शिद्दत से न पढ़ा करो
कुछ याद रह गया तो…हमें भूल नहीं पाओगे

सोचता हूँ बंद करूँ लिखना शायरी ये किसी के काम नहीं आती
उसकी याद तो दिलाती है पर उस की झलक नहीं दिखाती

आँसुओं और शराबों में गुजारी है हयात
मैं ने कब देखी थी बरसात मुझे होश नहीं
जाने क्या टूटा है पैमाना कि दिल है मेरा
बिखरे-बिखरे हैं खयालात मुझे होश नहीं

मैं अपनी सुबह शाम यूँ ही गुजार लेता हूँ
जो भी ज़ख्म मिलते हैं कागज़ पे उतार लेता हूँ

मुस्कुरा देता हूँ अक्सर देखकर पुराने खत तेरे
तू झूठ भी कितनी सच्चाई से लिखती थी

मेरी यादो मे तुम हो,
या मुझ मे ही तुम हो
मेरे खयालो मे तुम हो,
या मेरा खयाल ही तुम हो
दिल मेरा धडक के पूछे,
बार बार एक ही बात
मेरी जान मे तुम हो,
या मेरी जान ही तुम हो

मुझसे नफरत करके भी खुश ना रह पाओगे
मुझसे दूर जाकर भी पास ही पाओगे
प्यार में दिमाग पर नहीं दिल पर ऐतबार करके देखिये
अपने आप को रोम – रोम में बसा पाएँगे

याद तेरी आती है क्यो.यू तड़पाती है क्यो
दूर है जब जाना था.. फिर रूलाती है क्यो
दर्द हुआ है ऐसे,
जले पे नमक जैसे
खुद को भी जानता नही,
तुझे भूलाऊ कैसे

रोज रोज गिरकर भी मुकम्मल खड़ा हूँ,
ऐ मुश्किलों देखो मैं तुमसे कितना बड़ा हूँ।

चलते रहेगें शायरी के दौर मेरे बिना भी
एक शायर के कम हो जाने से शायरी खत्म नहीं हो जाती

वो इश्क के क़िस्से,
पुराने हो गए
उनसे बिछड़े हमें,
ज़माने हो गए
शमा तो जली इंत्ज़ार में रात भर
परवाने के झूठे सब,
बहाने हो गए

जिंदगी देने वाले,
मरता छोड़ गये
अपनापन जताने वाले तन्हा छोड़ गये
जब पड़ी जरूरत हमें अपने हमसफर की
वो जो साथ चलने वाले रास्ता मोड़ गये

ये कैसे मुनकिन है कि जिंदगी में गम न मिले
कोई हमें न मिला किसी को हम न मिले
क्या चाल चली है मेरे मुक्दर ने मुझसे
प्यार तेरा मिला मगर तुम न मिले

मेरे टूटने की वजह मेरे जौहरी से पूछो
उस की ख्वाहिश थी कि मुझे थोडा और तराशा जाये

आँसुओं और शराबों में गुजारी है हयात
मैं ने कब देखी थी बरसात मुझे होश नहीं
जाने क्या टूटा है पैमाना कि दिल है मेरा
बिखरे-बिखरे हैं खयालात मुझे होश नहीं

कुछ फासले तुम भी तो मिटाओ जान..हम तुम तक आये,
तो कहाँ तक आये

वो मस्जिद की खीर भी खाता है
और मंदिर का लड्डू भी खाता है ,
वो भूखा है साहब इसे मजहब कहाँ समझ आता है।

मौसम सर्द है और फिजां भी सुहानी है
बस तुम ,
तुम्हारी यादें और बाकि सब बेमानी है

सीख जाओ वक़्त पर किसी की चाहत की कदर करना
कही कोई थक ना जाए तुम्हे अहसास दिलाते दिलाते

मैं क्या हूँ ,
कैसा हूँ ,
जमाना सब जाने
खुली किताब सा जीवन हर कोई पहचाने
नेकी हो सदा मन में ,
हो लबों पर प्रेम तराने
खुशियाँ बांटू सबको ,
गम के किस्से हो पुराने

हवाओं की भी अपनी अजब सियासतें हैं
कहीं बुझी राख भड़का दे कहीं जलते चिराग बुझा दे

हर किसी कै किसमत मै ऐसा लिखा नही हौता .
हर मंजिल मै तैरै जैसा दौस्त का पाता नही मिलता
मैरी तकादीर हौगी कुछ खास
वरना तैरै जैसा यार मुझै कहा मिलता

जो वक्त पे रिप्लाइ नहीं देती
वो वक्त पे साथ क्या देगी

आग़ाजे़-आशिक़ी का मज़ा आप जानिये
अंजामे-आशिक़ी का मज़ा हमसे पूछिये

दुर रहने से मोहब्बत बढती है
यह कह कर वो शख्स मेरा शहर छोङ गया

जो तू साथ न छोड़े ता-उम्र मेरा ए मेहबूब
मौत के फ़रिश्ते को भी इनकार न कर दूं तो कहना
इतनी कशिश है मेरी मुहब्बत की तासीर में
दूर हो के भी तुझ पे असर न कर दूं तो कहना

मैंने उसे बोला ये आसमान कितना बड़ा है ना
पगली ने गले लगाया और कहा इससे बड़ा तो नहीं

तरसेगा जब दिल तुम्हारा मेरी मुलाकात को
ख्वाबो मे होगे तुम्हारे हम उसी रात को

झूठा अपनापन तो हर कोई जताता है,
वो अपना ही क्या जो पल पल सताता है,
यकीं न करना हर किसी पर क्यूंकि,
करीब कितना है कोई यह तो वक्त बताता है ।

किसी ने आज पूछा,
कहा से ढूढ लाते हो एसी शायरी
में मुस्कुरा के बोला उसके खयालो में डूबकी लगा कर

सादिक़ हूँ अपने क़ौल का ‘ग़ालिब’ ख़ुदा गवाह
कहता हूँ सच कि झूट की आदत नहीं मुझे

जरुरी नहीं की हर समय लबों पर खुदा का नाम आये,
वो लम्हा भी इबादत का होता है जब इंसान किसी के काम आये।

न जाने किस *रूप* मे आता हैं
हाथ पकड़ कर *पार* लगा देता है
मैं उसके सामने सिर *झुकाता* हूँ,
वो सबके के सामने मेरा सिर *उठाता*

ज़हर मीठा हो तो पीने में मज़ा आता है
बात सच कहिए मगर यूँ कि हक़ीक़त न लगे

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